ज्वर के कितने प्रकार के होते हैं - Gaon ki Duniya

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Friday, January 10, 2020

ज्वर के कितने प्रकार के होते हैं

ज्वर के कितने प्रकार के होते हैं 
health tips
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। जैसे - सामान्य ज्वर , शीत-ज्वर , पित्त-ज्वर , कफ-ज्वर , मलेरिया-ज्वर , सन्निपात-ज्वर आदि । और अलग-अलग ज्वर के लक्षण व इलाज के विषय में संक्षिप्त जानकारी दी गई थी । आज डेंगूँ के विषय में यह विस्तृत लेख है ।

डेंगूँ एक विषाणु जनित संक्रामक रोग है। इस रोग में तेज बुखार जड़ों में दर्द तथा माथा में दर्द होता है । कभी-कभी रोगी के शरीर में आन्तरिक रक्तस्त्राव भी होता है। व्यक्ति को जैसे ही पता चलता है कि उसे डेंगू है वह घबरा जाता है । डेगूँ में भी प्लेलेट्स बनता है लेकिन Decomposition ( विघटन ) के कारण हमें ऐसा लगता है कि प्लेलेट्स नहीं बन रहा है । जबकि होम्योपैथी में इस विघटन को रोकने के लिए दवाई आती है ।
डेगूँ चार प्रकार के विषाणुओं के कारण होता है तथा इस रोग का वाहक एडिस मच्छर की दो प्रजातियां हैं. साधारणतः वर्षा ऋतू से सर्दी के मौसम के संक्रमण काल में यह रोग महामारी का रुप ले लेता है जब मच्छरों की जनसंख्या अपने चरम सीमा पर होती है। यह संक्रमण सीधे व्यक्तियों से व्यक्तियों में प्रसरित नहीं होता है तथा यह भी आवश्यक नहीं कि मच्छरों द्वारा काटे गये सभी व्यक्तियों को यह रोग हो। डेगूँ के चारो विषाणुओं (टाइप 1,2,3,4) में से किसी भी एक से संक्रमित व्यक्ति में बाकी तीनों विषाणुओं के प्रति प्रतिरोध क्षमता विकसित हो जाती है. पूरे जीवन में यह रोग दुबारा किसी को भी नहीं होता है ।

डेंगू ऐसे फैलता है : -


डेंगू बुखार 'एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। ये दिन में भी काटते हैं। डेंगू बुखार से पीड़ित रोगी के रक्त में डेंगू वायरस काफी मात्रा में होता है। जब कोई एडीज मच्छर डेंगू के किसी रोगी को काटने के बाद किसी अन्य स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो वह डेंगू वायरस को उस व्यक्ति के शरीर में पहुँचा देता है। काटने के लगभग 3-5 दिनों बाद ऐसे व्यक्ति में डेंगू बुखार के लक्षण प्रकट हो सकते हैं। यह संक्रामक काल 3-10 दिनों तक भी हो सकता है।
डेंगू बुखार के लक्षण इस बात पर निर्भर करेंगे कि डेंगू बुखार किस प्रकार है। डेंगू बुखार तीन प्रकार के होते हैं:

(1) क्लासिकल (साधारण) डेंगू बुखार---


यह एक स्वयं ठीक होने वाली बीमारी है तथा इससे मृत्यु नहीं होती ।
(2) डेंगू हॅमरेजिक बुखार (डीएचएफ)-- डीएचएफ का तुरंत उपचार शुरू नहीं किया जाता है तो वे जानलेवा सिद्ध हो सकते हैं ।
(3) डेंगू शॉक सिंड्रोम (डीएसएस)---
डीएसएस का भी तुरंत इलाज शुरू करना चाहिए । इसलिए यह पहचानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि बीमारी का स्तर क्या है।
लक्षण :

(1) ठंड के साथ अचानक तेज बुखार चढ़ना ।
(2) सिर, मांसपेशियों तथा जोड़ों में दर्द होना ।
(3) अत्यधिक कमजोरी लगना, भूख में बेहद कमी तथा जी मितलाना , उल्टी होना ।
(4) मुँह का स्वाद खराब होना ।
(5) गले में हल्का सा दर्द होना ।
(6) रोगी बेहद दुःखी व बीमार महसूस करता है ।
(7) शरीर पर लाल ददोरे (रैश) का होना शरीर पर लाल-गुलाबी ददोरे निकल सकते हैं। चेहरे, गर्दन तथा छाती पर विसरित दानों की तरह के ददोरे हो सकते हैं। बाद में ये ददोरे और भी स्पष्ट हो जाते हैं ।
उपचार : -
यदि रोगी को साधारण डेंगू बुखार है तो उसका उपचार व देखभाल घर पर भी की जा सकती है चूँकि यह स्वयं ठीक होने वाला रोग है, इसलिए केवल लाक्षणिक उपचार ही चाहिए :
(1) √ पेरासिटामॉल की गोली या शर्वत लेकर बुखार को कम रखिए।
(2) × रोगी को डिस्प्रीन, एस्प्रीन , Diclofenac कभी ना दें।
(3) यदि बुखार 102डिग्री फा. से अधिक है तो बुखार को कम करने के लिए हाइड्रोथेरेपी (जल चिकित्सा) करें, पानी की पट्टी रखें ।

डेंगू और आयुर्वेद : -


ऊपर तो डेंगू के आधुनिक एलॉपथी दृष्टिकोण की बात हुई अब बात करते हैं आयुर्वेद की । आयुर्वेद के अनुसार मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द वात और इंटरनल ब्लीडिंग पित्त के विकृत होने के कारण माना जाता है । डेंगू की शुरूआत एडीज मच्छर के काटने के बाद जठराग्नि (भूख) कम होने और टॉक्सिन यानि शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ एकत्र होने के कारण होती है , तत्पश्चात, वात और पित्त दोष बढ़ने लगते हैं ।

वात व पित्त का संतुलन :-


आयुर्वेद में डेंगू का इलाज तीनो दोषों को संतुलित करके किया जाता है इसके अंतर्गत विषैले पदार्थो को पचाने, जठराग्नि बढ़ाने, वात और पित्त को संतुलित करने व बुखार को कम करने के लिए खस, संदल (चंदन), गिलोय जैसी जड़ी-बूटियां लाभकारी होती हैं । पित्त को संतुलित करने और खून बहने से रोकने के लिए ठंडक प्रदान करने वाली दवाएं जैसे खस, संदल, कामादुधा रस, चन्द्रकला रस आदि का प्रयोग किया जाता है
डेंगू रोगी को खाने योग्य पदार्थ :-
पपीता, पपीते के पत्तों का स्वरस , बकरी का दूध अनार, मौसमी , सेव , चीकू, किशमिश , मुनक्का , मूंग की दाल , गाजर , चुकंदर, सूप , लौकी , तोरई , कद्दू , परवल , टिंडा की पतली सब्जी, धनिया, जीरा आदि का अल्प मात्रा में प्रयोग करना चाहिए...
निम्न औषधियों का प्रयोग रोग इस रोग में लाभदायक है: -
(1) सर्व ज्वर हर लौह , सुदर्शन घन वटी , स्वर्ण सूत शेखर रस इनकी एक-एक गोली दिन में दो बार.. अमृता रिष्ट 15-15 ml दिन में दो बार दें (ये दवाएं क्लासिकल (साधारण) डेंगू बुखार में चिकित्सक की सलाह से ही दें ।)
(2) तालिसादि चूर्ण 60 ग्राम, अभ्रक भस्म 10 ग्राम, गिलोय सत्व 10 ग्राम , मुक्ता शुक्ति पिष्टी 10 ग्राम , स्वर्ण माक्षिक भस्म 10 ग्राम , प्रवाल पंचामृत / प्रवाल पिष्टी - 5 ग्राम इन सभी औषधियों को मिलाकर 2-2 ग्राम की मात्रा शहद के साथ दिन में दो बार दें । मकोय अर्क 10-10 ml दिन में दो बार , जय मंगल रस की 1 गोली रात्रि में 10 दिन तक दें ( यदि डेंगू बढ़ी हुई अवस्था में है फीवर बहुत तेज है तो क्रमश: एक के साथ इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिए )
(औषधियों की मात्रा वयस्क रोगी के अनुसार है रोग एवं रोगी की स्थिति के अनुसार मात्रा में परिवर्तन किया जा सकता है )
इन औषधियों के अतिरिक्त रोग और रोगी की स्थिति के अनुसार पथ्यादि क्वाथ और स्वर्ण बसंत मालती रस का प्रयोग आवश्यकता होने पर किया जा सकता है ।
डेंगू पर एक और औषधीय प्रयोग :-
एक गोली महासुदर्शन घन वटी+एक गोली सप्त पर्ण घन वटी+एक गोली महाज्वरान्कुश रस+एक गोली आनद भैरव रस
इन चारों गोलियों को मिलकर एक खुराक दवा बनायें तथा तुलसी, गिलोय के काढ़े अथवा शहद से दिन में तीन से चार बार रोग की तीव्रता अनुसार दें , एक या दो दिन में बुखार और इसके उपद्रव ठीक हो जाते है. (यह औषधियां बुखार की शुरुवात से ही देना प्रारंभ कर देना चाहिए) ।
डेंगू का कारगर उपचार आयुर्वेद में उपलब्ध है। प्राथमिक अवस्था में तो साधारण दिखने वाले घरेलु प्रयोग भी बहुत अच्छा काम करते है. ऐसे ही कुछ प्रयोग निम्न प्रकार है :
1. लौंग, इलायची, सौंठ, हल्दी, दालचीनी, गिलोय, तुलसी, कालीमिर्च व पिप्पली इन सबके समान मात्रा के पाउडर को एक चम्मच लेकर तीन कप पानी में उबाले और एक कप रह जाने पर छान कर शहद मिलाकर पिए ..यदि गिलोय और तुलसी ताज़ी मिल जाये तो बेहतर है ...रोगी को मधुमेह भी है तो शहद की मात्रा कम रखे..
2. डेंगू के संदिग्ध रोगी को सुबह शाम तुलसी, अदरक, कालीमिर्च, गिलोय के समभाग मिश्रण और शहद से निर्मित काढे का उपयोग दिन में दो तीन बार करना चाहिए।
3. गिलोय घन्सत्त्व एक से दो रत्ती सुबह खाली पेट लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है ।
4. यदि प्रतिदिन गिलोय की 6 इंच लम्बी बेल को रोज़ चबाकर रस निगल लिया जाये तो इसका वायरस शरीर में पहुचकर भी सक्रिय नहीं हो पायेगा ।
5. 150 मि.ली. पानी में 3-3 ग्राम नीम, गिलोय, चिरैता के साथ आधा ग्राम काली मिर्च और एक ग्राम सोंठ का काढ़ा बना कर पीना भी काफी लाभदायक रहता है। इन चीजों को पानी के साथ तब तक उबालना है जब तक वह 60 मिली ग्राम न रह जाए। इसे एक सप्ताह के लिए रोज सुबह खाली पेट पीने पर डेंगू से लड़ने के लिए शरीर में जरूरी इम्यूनिटी पैदा हो जाएगी
6. त्रिफला, त्रिकटू, मुलहठी और गिलोय को समान मात्रा में लेकर उसे एक चम्मच लेने से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इससे बुखार भी कम होता है। इस दवा को खाना खाने के बाद दो बार लेने से फायदा होगा ।
होम्योपैथी में :- (4) होम्योपैथी में एक दवा है Eupatorium Perfoiam -200 इसकी 3-4 बूंदे आधे कप पानी में डालकर दें । यह तीव्र बुखार में बेहद कारगर है ।
* डेगूँ के समय यदि प्लेटलेट्स कम होने का अंदेशा है तो दिन में सिर्फ एक बार Crotalus Harridus - 30 की पांच बूंद पानी में डालकर दे सकते हैं । लेकिन दुबारा बिना डाक्टर के सलाह के मत दें ।

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